कृष्ण जी की आरती / Krishna Ji Ki Aarti

Last updated: 22 Sep 2026

श्री कृष्ण जी की आरती

\nश्री कृष्ण जी की आरती

भगवान श्री कृष्ण को प्रेम, भक्ति और लीलाओं के देवता के रूप में पूजा जाता है। जन्माष्टमी, प्रतिदिन की संध्या पूजा और मंदिरों में यह आरती विशेष श्रद्धा से गाई जाती है।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्णमुरारी की।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला॥
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
आरती कुंजबिहारी की...

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक कस्तूरी तिलक।
चंद्र सी झलक ललित छवि श्यामा प्यारी।
आरती कुंजबिहारी की...

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग मधुर मृदंग।
ग्वालिन संग अतुल रति गोप कुमारी।
आरती कुंजबिहारी की...

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणी श्री गंगा।
स्मरण ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस जटा के बीच।
हरै अघ कीच चरण छूत सुरसरि नारी।
आरती कुंजबिहारी की...

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिशि गोपि ग्वाल धेनू, हंसत मृदु मंद चांदनी पद चंद।
छटा बनी है अति दर्श परम सुखकारी।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्णमुरारी की॥

महत्व

यह आरती श्री कृष्ण के वृंदावन-बिहारी स्वरूप, उनके श्रृंगार और गोपियों के साथ रासलीला का सुंदर वर्णन करती है। जन्माष्टमी और नित्य संध्या आरती में इसे गाया जाता है।

Frequently Asked Questions

कृष्ण जी की आरती कब गाई जाती है?

प्रतिदिन की संध्या आरती और जन्माष्टमी के अवसर पर श्री कृष्ण की यह आरती विशेष रूप से गाई जाती है।

आरती में 'कुंजबिहारी' का क्या अर्थ है?

'कुंजबिहारी' श्री कृष्ण का ही एक नाम है, जिसका अर्थ है वृंदावन के कुंजों (लताकुंजों) में विहार करने वाले — यह उनकी वृंदावन लीलाओं का सूचक है।

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