उड़ उड़ रे म्हारी ज्ञान चुनरियाँ
उड़ उड़ रे म्हारी ज्ञान चुनरियाँ, उड़ उड़ रे |
केवलज्ञान की ओढ़नी लहरे, उड़ उड़ रे ||
जिनवर ने जब ज्ञान पाया, तीनों लोक में अजियारो छाया |
मिथ्यात्व का अंधेरा छँटा, सम्यक्त्व का दीप जलाया ||
उड़ उड़ रे म्हारी ज्ञान चुनरियाँ ||
चार घाती कर्म नाशे, अनंत चतुष्टय प्रकाशे |
केवली भगवान बने जिनवर, समवसरण में बिराजे ||
उड़ उड़ रे म्हारी ज्ञान चुनरियाँ ||
ज्ञान-कल्याणक की वेला आई, देव-गण मंगल गाई |
गणधर ने वाणी को धारण किया, जिनागम बन जग में आई ||
उड़ उड़ रे म्हारी ज्ञान चुनरियाँ ||