श्री सरस्वती चालीसा
सरस्वती चालीसा विद्या, बुद्धि और वाणी की देवी सरस्वती की स्तुति है। ये चालीसा विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्व रखती है। जब भी परीक्षा का वक्त नजदीक आता है या ज्ञान प्राप्त करने का सही और उपयुक्त अवसर मिलता है, तब अक्सर विद्यार्थी इस चालीसा का पाठ बड़े ध्यान और श्रद्धा से करने में संलग्न हो जाते हैं। पढ़ाई के कठिन और तनावपूर्ण समय में इसे पढ़ने से मानसिक शक्ति मिलती है, जिससे विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई में बेहतर फोकस बना पाने में मदद मिलती है, क्योंकि ये एक तरह का संजीवनी उपाय होता है।
दोहा
जनक जननि पद कमल रज, निज मुख मुकुर समान।
निज मन मुकुर सुधारि के, कहौं सरस्वती जान॥
Janak Janani pad kamal raj, nij mukh mukur samaan.
Nij man mukur sudhari ke, kahau Saraswati jaan.
चौपाई (मुख्य अंश)
जय जय जय जगदम्ब भवानी। जय सरस्वती वर दायक ज्ञानी॥
मात सकल गुण शील सुजानी। जय जगदम्ब जगत की स्वामिनी॥
चार भुजाधारी दिखलावो। हंस सवारी सोहत भाओ॥
अमल कमल दल सी छवि तोरी। यही छवि छाई जग गोरी॥
जग में महिमा अधिक तुम्हारी। कृपा करौं गुण गाऊं भारी|||
कमल आसन पर करत विराजा। सुंदर वेणी पर सिर ताजा॥
Jay Jay Jay Jagdamba Bhavani. Jay Saraswati var daayak gyaani.
Maat sakal gun shil sujani. Jay Jagdamba jagat ki swamini.
Chaar bhujaadhari dikhlaavo. Hans sawari sohat bhaao.
Amal kamal dal si chhavi tori. Yahi chhavi chhai jag gori.
Jag mein mahima adhik tumhaari. Kripa karau gun gahun bhaari.
Kamal aasan par karat viraja. Sundar vaeni par sir taaja.
महत्व
सरस्वती चालीसा का पाठ खासकर विद्यारंभ के समय, परीक्षा से पहले और बसंत पंचमी के दिन करना सचमुच बहुत फायदे वाला माना जाता है। जब ये नियमित रूप से पढ़ी जाती है, तो खुद को ध्यान केंद्रित करने में हाथ बटाने मदद मिलती है और साथ ही वाणी में मिठास भी आ जाती है, जिससे संवाद में भी सहुलियत होती है। कई लोग इसे सुबह के समय निश्चल माहौल में पढ़ना पसंद करते हैं ताकि पूरे दिनभर सकारात्मक रवैया अपनाए रख सकें। यह किसी पूजा-पाठ का हिस्सा बन सकता है या एक अंतःक्रियात्मक अभ्यास भी हो सकता है – इसे जिस प्रकार से चाहें अपनाएं!