हरतालिका तीज व्रत कथा
हरतालिका तीज भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष के तृतीया दिन मनाई जाती है। इसे खासकर पार्वती माता को समर्पित किया गया है, और विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत को करती हैं। वहीं दूसरी ओर, अविवाहित कन्याएं अपने सपनों का वर पाने के उद्देश्य से इस पर्व को मनाती हैं, ताकि उनको उनके मनचाहे जीवनसाथी का मिलन हो सके। लेकिन ये व्रत सिर्फ एक प्रथा या कोई खेल नहीं है। यह कुछ खास अर्थ रखता है। इस दिन महिलाएं अपने-अपने पति की सुख-समृद्धि और चैन के लिए उपवास रखकर घंटों बैठकर प्रार्थनाएं करती हैं, इसके साथ ही यह भी कामना करती हैं कि उनका परिवार हमेशा खुश रहे। वहीं, अविवाहित कन्याएं अपने मन में बसी कल्पनाओं में छिपे वर की तलाश में सच्ची चाहत से बैठती हैं। कई बार अपनी व्यक्तिगत भावनाओं के अनुसार संतुलन साधने की कोशिश भी करती हैं, जिससे उनकी तपस्या के फलस्वरूप न केवल संतोष बल्कि असली खुशियों का अनुभव हो सके।
कथा
कथाओं के अनुसार यह कहा जाता है कि मान्यता में माता पार्वती ने भगवान शिव को अपना पति पाने के लिए कठोर तपस्या ज़लमिकल करी थी। उनके पिता, हिमालय राज, का इरादा था कि उनका विवाह भगवान विष्णु से किया जाए, लेकिन पार्वती जी ने अपने सहेलियों के सामने पहले ही साफ कह दिया था कि उन्हें तो भगवान शिव ही बेहद पसंद हैं। अपनी एक सोच पर अडिग रहकर और डटकर अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उनकी सखियों ने उन्हें सिर्फ प्यार और खुशियों में डुबाने की बजाय गुप्त रूप से घने एवं घातक जंगल में ले जाकर छोड़ दिया, जहाँ पर पार्वती जी ने न खाने और न पीने का बड़ा संकल्प लेकर कठोर तपस्या करना जारी रखा, जो आसान नहीं था। काफी समय बाद तक ऐसी कठिनाई सहने से भगवान शिव प्रसन्न हुए, और अंततः उन्होंने खेल-खेल में पार्वती जी को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया। इसलिए, इसे 'हरतालिका' कहते हैं, जो उस तालिका का संकेत करता है जो उनकी सहेलियों ने तैयार की थी ताकि वह अपनी मंजिल तक पहुँच सकें और अंततः अपना धन्य विवाह कर सकें।
पूजा विधि
इस खास अवसर पर महिलाएं जो इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए श्रद्धा पूर्वक धार्मिक आयोजनों में भाग लेती हैं, वे रेत या मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाती हैं। इससे पूजा विधि पूरी हो जाती है और इसका संकल्प यथावत होता है। रातभर जागरण करके भजन गाए जाते हैं, जिससे भक्तिमय एवं आध्यात्मिक वातावरण बनता है जिसे सभी लोग मिलकर महसूस करते हैं। फिर अगले दिन सुबह उन्हें पारण करके अपने उपवास का सफल इंतज़ाम करना होता है, जो उसका अंतिम चरण होता है। यह पारण सिर्फ खाने पीने का वक्त नहीं होता, बल्कि इसे उनके संकल्पों और मेहनत का महत्वपूर्ण फल माना जाता है और इसके बाद कई बार तमाम इच्छाओं की पूर्ति होती है। पूजा करने वाली हर देवी मां से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें सफलता मिले और जिससे सुखद परिणामों की प्राप्ति हो सके или आने वाले समय मे उनके जीवन में शांति बने रहे।