पर्युषण पर्व
पर्युषण जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है, जो आत्म-शुद्धि, तप और क्षमा-याचना का पर्व माना जाता है। श्वेतांबर परंपरा में यह आठ दिनों का होता है, जबकि दिगंबर परंपरा में इसे दस दिनों तक 'दशलक्षण पर्व' के रूप में मनाया जाता है।
महत्व
पर्युषण के दिनों में जैन श्रद्धालु उपवास, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण (अपने दोषों का चिंतन) और ध्यान में समय बिताते हैं। दिगंबर परंपरा में इन दस दिनों में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य — इन दस धर्मों का चिंतन किया जाता है।
संवत्सरी और क्षमावाणी
पर्युषण के अंतिम दिन को संवत्सरी कहा जाता है, जब जैन समाज "मिच्छामि दुक्कडम्" कहकर वर्षभर में जाने-अनजाने हुई सभी भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं। इसी भावना को क्षमावाणी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, जो जैन धर्म की अहिंसा और क्षमाशीलता की मूल भावना को दर्शाता है।
पर्व मनाने की विधि
इन दिनों मंदिरों में विशेष पूजा, प्रवचन और सामूहिक स्वाध्याय आयोजित किए जाते हैं। कई श्रद्धालु इन दिनों उपवास या एकाशन (दिन में एक बार भोजन) व्रत रखते हैं।